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पुस्तक - राष्ट्रीय शिक्षण धोरण 2019: जनतेच्या शिक्षण कत्तलीचा जाहीरनामा.

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पुस्तक - राष्ट्रीय शिक्षण धोरण 2019: जनतेच्या शिक्षण कत्तलीचा जाहीरनामा. लेखक - रमेश बिजेकर, नागपूर डाऊनलोड PDF  https://drive.google.com/file/d/1G3O7YDgZcSi4-WsPd0TutzlRTaYAalle/view

लोकतंत्र की लड़ाई में युवा वर्ग कहा हैं?

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एक तरफ़ देश में अंबेडकर वादी, मार्क्सवादी, पुरोगामी, गांधी वादी संघटन ओर बुद्धिजीवी वर्ग की तरफ़ से लोकतंत्र को ओर लोकतंत्र में स्थित शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे अधिकारों को बचाने के लिए हर क्षेत्र से लड़ाई लड़ी जा रहीं हैं। जिसमें प्रोफ़ेसर, शिक्षक/शिक्षिका, डॉक्टर, वकील, मजदूर, लेखक, कलाकार, पत्रकार, अधिकारी कुल मिलाकर निजी ओर सरकारी क्षेत्र में काम करने वाला वर्ग आंदोलन कर रहा हैं, लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रहा हैं। वैसे में सरकार ओर न्याय व्यवस्था किस के साथ खड़ी हैं, किस तरफ़ अपने कदम बड़ा रही हैं इसके कई उदाहरण हमें देखने को मिल रहे हैं।  "NRC , CAA के खिलाफ आंदोलन कर चुके आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा हैं, तो कहीं पर मजदूरों के हितों के खिलाफ मजदूर कानून में बदलाव किए जा रहे हैं, सरकार के ऑनलाइन शिक्षा के जिद की वजह से कई छात्र/छात्राएं शिक्षा में पिछड़ रहे हैं, जाती को मजबूती देने वाली ऑनार किलिंग जैसी घटनाएं सामने आ रही है, ऑनलाईन शिक्षा के खिलाफ किसी भी तरह की बात की तो वह राष्ट्रहित के विरोध में होगी ऐसा फैसला न्याय व्यवस्था की ओर से सुनाया जा रहा ह...
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13 फ़रवरी एक विद्रोही शायर का जन्मदिन 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' पिछले कुछ दिनों में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म "हम देखंगे" को लेकर देश में जो विवाद हुआ उस विवाद से फ़ैज़ को और फ़ैज़ की नज़्म को ना पसंद करने वाले लोग या फ़ैज़ की उस नज़्म को लेकर राजनतिक करने वाले लोगों ने उस नज़्म को देश के उन आम लोगो तक पहुंचा दिया जीनोन फ़ैज़ का शायद अपनी जिंदगी में कभी नाम तक नहीं सुना हो गा। लेकिन प्रतिक्रान्ति कभी कभी इतनी मजेदार होती हैं। की ख़ुद प्रतिक्रान्ति की चाहत रखने वालों की वजह से लोगो में क्रांति की मंशा जाग उठती हैं। ख़ैर फ़ैज़ के जिंदगी में ऐसे कई लोग हो गए जिन्होंने फ़ैज़ के नज़्म के साथ साथ फ़ैज़ का भी विरोध किया हैं। साथ ही कई बार उनकी गिरफ्तारी तक हुवीं हैं। लेकिन फ़ैज़ को ना पसंद करने वालो ने ना उस वक्त यह समझा ना इस वक्त समझ पा रहे हैं कि फ़ैज़ इतने बड़े और इतने पसंद किए जाने वाले शायर हैं। जिनकी नज़्म रूसी तथा अरबी भाषा में प्रकाशित हो चुकी हैं। इतना ही नहीं केवल रूसी भाषा में फ़ैज़ के शायरी की दो लाख दस हज़ार प्रतिया प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही 1962 ई. में उन्ह...
दिल्ली_की_मेट्रो_ओऱ_गाँवो_में_बस_की_कमतरता। आज दिल्ली में दूसरा दिन ओऱ दो दिनों से कईसारी चीजो को जान रहा हु। इस दौरान कल में ओऱ मेरे साथी मेट्रो से जा रहे थे। मस्ती मजा ओऱ कई मुद्दों पर बाते भी हो रही थी उस दौरान एक साथी ने ( नाम बताने की इजाज़त नही लीया हु इस लिए नाम अज्ञात है) युही बोलते बोलते कहा कि पीछले कुछ वर्षों पहले शायद यह घोषणा हुवी थी कि महिलाओं के लिए मेट्रो से यात्रा करना मुफ़्त होगा। शायद इस में हक़ीक़त नही भी हो सकती हैं। क्योंकि उनोने भी इसके बारे में सिर्फ़ सुना था। फिर मैंने उन से कहा कि मेट्रो से यात्रा करना महिलाओं के लिए मुफ़्त हैं भी तो उसका लाभ कोनसी महिलाएं उठाएं गी? उनका वर्ग (क्लास) क्या? होगा, मेट्रो से कोन से वर्ग (क्लास) की महिलाएं यात्रा करती है? यह सारे सवाल हमारे उस भागदौड में लुफ़्त हो गए ओऱ वह साथी उसके आगे बढ़कर कहने लगी कि स्कूल कॉलेज जाने वाली लड़कियों के लिए ही सही बस में मेट्रो में आदि जगहों से यात्रा करना मुफ़्त होना चाहिए। उनका कहना सही था लेक़िन मैंने उससे आगे जाकर कहा कि यह आपका तो सही है। लेक़िन ऐसी कई जगह है कई समुदाय है कई जातियां है कई गांव है जहाँ ...
आनंदी गोपाळ (चित्रपट) एक म्हण आपल्या समाजात रूढ झालेली आहे "प्रत्येक यशस्वी पुरुषा मागे एका स्त्री चा हात असतो" यात स्त्रीचा जरी उद्धार दिसत असला किंवा स्त्री जरी महत्वाची वाटत असली तरी या म्हणी मागे एका प्रकारची पितृसत्ताक मानसिकता आहे. म्हणजे स्त्री जाती ने फक्त यशस्वी पुरुष घडवायचेत आणि स्वतःला समाधानी मानून शांत बसायचं परंतु याच्याच उलट जर अशी म्हण निर्माण झाली की "प्रत्येक यशस्वी स्त्रीयांन मागे एका पुरुषाचा हात असतो" किंवा एका पुरुषाने जर एका स्त्री ला आपल्या पेक्षा जास्त ज्ञानी होण्यासाठी उठा ठेप केली समाजाशी भिडून गेला जाती धर्मा सोबत लढला आणि मला तुझ्या सारखी ज्ञानी जीवनसाथी मिळाली म्हणून मी धन्य झालो अस म्हटला तर ते पितृसत्तेच्या थोबाळीत मारण्या सारख होईल. तसेच आनंदी गोपाळ चित्रपटावर लिहीत असतांना चित्रपट निर्माता कोण आहे किंवा चित्रपटात गोपाळराव, आनंदीबाई यांची भूमिका कोणी साकारली हे लिहिण्याचा हेतू मुळीच नाही.       "आनंदी गोपाळ" हा चित्रपट भारताची पहिली महिला डॉक्टर " डॉ. आनंदीबाई गोपाळराव जोशी" यांच्या जीवन चरित्रावर आधारित आहे. या...
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भारत की तकलादु शिक्षा नीति ने 10th के छात्र की हत्या की। 94 % गुणों से पास होने वाला छात्र जब आत्महत्या करता है? उस्मानाबाद में देवलाली गाँव से अक्षय शहाजी देवकर इस छात्र ने 10th कक्षा में 94 % अंक हासिल किए लेक़िन उसको आगें की शिक्षा लेने के लिए किसी भी महाविद्यालय में दाखिला नही मिला ओऱ साथ ही किसान के घर से होने की वजह से मुह बोली रक़म नही भर सका तो उस छात्र ने आत्महत्या करना सही समझा. यह घटना में आज सुबह से सोशल मिडियापर सुन/पढ़ रहा हु। इस घटना के साथ आत्महत्या का कारण मराठा आरक्षण न मिलना भी बताया जा रहा है। आज में पहली बार आरक्षण को लेकर कोई बात कहने जा रहा हु। शायद आरक्षण इसका एक कारण हो भी सकता है लेक़िन क्या आरक्षण मिलने के बाद भी यह छात्र आगे जकर इस व्यवस्था में आरक्षण लेकर टिक पाता? मेरी पूछो तो नहीं! उससे अच्छा तो आत्महत्या करना सही है। इसका मतलब यह नही की में आत्महत्या का समर्थन या फ़िर आरक्षण का विरोध कर रहा हु। आरक्षण एक तरह का प्रतिनिधित्व है जो शिक्षा, राजनीति या फ़िर रोज़गार में हर उस जाती को आरक्षण के तहत उस जाती को समुदाय को प्रतिनिधित्व करने का मौका देता है। ...
विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा? आज दिनांक ३० में २०१९ को भारत के राष्ट्रपति भवन में भारी बहुमत से चुनकर आयी भारतीय जनता पार्टी जिसको मोदी सरकार भी कहा जाता है। उसके नेताओं ने आनेवाले पांच साल के लिए शपथ लिया। इस शपथ में सबसे शुरुआत में यह शपथ होती है कि "विधि द्वारा स्थापित भारत के सविंधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा/रखूंगी" और उस शपथ विधि को भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा सम्प्पन किया जा गया। वैसे हम अगर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी की बात करे तो वह एक ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनको अछूत होने की वजह से मंदिर में जाने से रोक दिया गया था। सबसे पहले भारतीय सविंधान की मृत्यु तो यहीं पर हो गया था। लेक़िन यह हक़ीक़त है कि उसके विरुद्ध कोई भी आवाज नहीं उठाई जाती। तो हम बात कर रहे थे 'संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा' रखने की, वैसे अगर देखा जाए तो यह भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत के सविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखे। किन्तु व्यवहार में ऐसा होते नहीं दिखाई देता है। लेक़िन जो ल...
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बचपन को गलियों में... बचपन में डर नाम की कोई जिच ही नही होती थी। लेकिन जबसे उम्र में बड़े हुवे है तो कभी हारने का डर है तो कबी जितने का डर है, पैसा नही है तो डर है पैसा है तो डर है, सच बोलू तो डर है झूट बोलू तो डर है। हर रोज एक नए डर के साथ शुरवात होती है और रात भी डर के मारे ही गुज़रती है। वैसे में बचपन ही एक ऐसा दौर होता था जिसमे किसी बात का डर नही था सिवाय किसी कक्षा में असफ़लता मिलने के। जब स्कूल में पढ़ते थे तो स्कूल से बीच की छुट्टी में ही भाग जाते और भागकर कोई गलत काम नही सिर्फ़ नदी में तैरने जाते थे। जबकि हम में से एखाद को ही तैरना आता था फ़िर भी इस बात का डर नही था कि हम कही पानी मे डूब न जाएं। स्कूल से निकलते ही ठामकर निकलते थे कि तैरना आये या ना आये बस तैरना है। कई बार नदी में पानी छोड़े हुवे दो दिन भी नही हुवे होते हम तैरने पहुच जाते। वैसे में हम में से सब के सब एक ना एक बार डूबते डूबते बचे है लेक़िन फ़िर भी तैरने के लिए फ़िरसे जाते थे। आज उन नदियों से न जाने कितनी बार पानी बहकर निकल गया नदी के कितने किनारें पानी के प्रवाह से कटते गए और उम्र बहते पानी के साथ बहती गयी बची रही बस ...
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बचपन की गलियों में... बचपन मे सीखी हुवी कुछ चीजे इंसान जिंदगी भर नही भूलता फिर वह नदी में तैरना हो, खेल से जुड़ी चीज हो कोई गीत हो या फ़िर पेड़पर चढ़ना हो। कभी नही भूलता क्योंकि वह पूरे मन से की जाती थी उसमें अपनी ख़ुद की खुशियां होती थी। बचपन मे स्कूल से बीच मे ही भागकर कभी नदियों में तैरना होता था तो क़भी आम के मौसम में आम के पेड़पर चढ़ना। फ़िर आम तोड़कर उसको नमक लगाकर खाया जाता था तब नाही ख़ासी होती थी नाही गला ख़राब होता था क्योंकि वह बचपना था। क़भी क़भी आम के पेड़ का मालिक देख लेता तो पीछे भागता था तब बड़ी मुसीबत होती थीं लेक़िन उस वक़्त पेड़पर कितने भी ऊपर क्यो ना हो कूद जाते थे और भागते थे। तब नाही पैर में चोट आती थी नाही क़मर में चमक उठती थी। लेक़िन जबसे उम्र से बड़े हुवे है मानों यह सब चीजें छूट सी गयीं है वैसे में आज अगर पेड़पर चढ़ने का नदी में तैरने का मौका मिल जाये तो उसको छोड़ नही पाते है। 🌳🌳🌳🏊🏊🏊 तुषार पुष्पदिप सूर्यवंशी
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क्या आप इनसे मिले हैं? आइए, आपको इनसे मिलवाता हूँ। वैसे इनका नाम तो मुझे भी पता नहीं लेकिन अक्सर इनकी चर्चा हर जगह मैंने सुनी है। सबसे पहले संविधान बनाते समय संविधान सभा मे सुनी। उसके बाद यही चर्चा 26 नवंबर, 1949 को संविधान को बनकर तैयार होते हुए दिखी। लेकिन फिर 1949 से लेकर आज 2019 तक मैंने उन पर हर बार चर्चा होते हुए सुनी है। सवाल तो यह है कि इनको लेकर कहाँ पर चर्चा नहीं हुई, हर जगह पर मैंने इनको लेकर चर्चा होती देखी। कभी लोक सभा में तो कभी राज्यसभा में, कभी न्यायपालिका में तो कभी उच्च न्यायपालिका में, कभी चुनावी प्रचार में तो कभी नेताओं की सभा में, कभी अख़बारों में तो कभी चाय के ठेले पर। कभी-कभार तो मैंने इनको लेकर होने वाली चर्चा को चाय के ठेले से उठकर दिल्ली की सड़कों तक जाते देखा है। सवाल यह भी है कि इस चर्चा से आखिर होता क्या है? तो मैंने सुना है कि इनको लेकर होने वाली चर्चा कभी सरकार गिराती है तो कभी सरकार बनाती है। कभी पार्टी को मज़बूत बनाती है, तो कभी कमजोर बनाती है, कभी संगठन बनाती है, तो कभी संगठन को ही पार्टी बना देती है। ख़ैर अब ज्यादा सब्र न करते हुए आपको उनसे मिला ही देता...
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रेल,खिलोना,बच्चा,मर्द-औरत औऱ पितृसत्ताक पद्धति। बचपना लौटकर नही आता है बचपना छुप जाता है उम्र के साथ। आप कहेंगे क्या यह भी कुछ लिखने का विषय हो सकता है। में कहूंगा यह भी लिखने का विषय होना चाहिए। तो बात कुछ ऐसी है। दिनांक २२ दिसंबर २०१८ को रेल से गुजर रहा था रात के ९ बजे के आसपास का समय था बहोत जादा भीड़ थी जो हमेशा रहती है। जिसकी वजह है बढ़ती लोकसंख्या औऱ रेल के डिब्बे की कमी। दूसरी वजह जो बहोत खास है जिसपर गौर करना चाहिए। भारत मे आरक्षित सीट पाकर यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या बिना आरक्षित सीट से यात्रा करने वालो से बोहोत कम है। कुछ सरकारी आंकड़ा अबतक नही निकला है इसलिए जो आँखोदेखि दिखता है। इसका मतलब यह नही की जो जनरल से यात्रा करते है उनको आरक्षित सीट नही मिलती। बल्कि कारण है कि वह लोग आरक्षित सीट पा सखे वैसे उनके हालात नही है। क्योंकि ९० प्रतिशत पैसा १० प्रतिशत लोगो के पास है। औऱ १० प्रतिशत पैसा ९० प्रतिशत लोगो के पास उसके बावजूद भी अगर गरीब जनता कोशिश करने के बाद पैसे जुटाकर आरक्षित सीट पाना भी चाहे तो पा नही सकते है। क्योंकि वहाँपर भी दलाल अपना घर जमा बैठे है। क्योंकि उनक...
विधवा औरत वो शब्द मेरे दिलपर दस्तक दे रहा था जिसने मेरी माँ को विधवा कहा था। लेकिन जैसे भारतीय संविधान की बनायीं व्यवस्था में जब एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन जाता है तब वह भारतिय संविधान की जीत साबित होती है। हा वह बात अलग है कि उसका कोई आधार नही है कि प्रधानमंत्री ने कभी चाय बेची थी या किसीने उनकी चाय पी थी। लेकिन यह भारतीय संविधान की विशेषता है कि एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है। जैसे भारतीय संविधान में चाय वाला प्रधानमंत्री बनाने की विशेषता है। वैसे ही भारतीय संविधान की खास विशेषता है। की भारतीय संविधान महिलाओं का संमान करती है। उनको हर तरह का अधिकार देती है। उनके अधिकारों का संरक्षण करती है। लेकिन क्या भारत के प्रधानमंत्री महिलाओं का संमान करते है ? उलटा भारत के प्रधानमंत्री विपक्ष पार्टी की प्रधानमंत्री को कांग्रेस की विधवा कहकर सम्भोदित करते है तो क्या इसमे महिलाओं का संमान है ? यह कांग्रेस की महिला के प्रतीक में हर उस महिला का अपमान है जो भारतीय संविधान में स्वतंत्र है। जिनका संमान भारतीय संविधान करता है। जिनके अधिकारों का संरक्षण भारतीय संविधान करता है। लेकिन भारतीय जनता ...
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हिन्दू-मुस्लिम हिन्दू मुस्लिम यह नाम मे अक्सर बचपन से सुनता आ रहा हु उसकी कुछ वजह भी है पहली वजह मेरा जन्म ख़ुद हिन्दू धर्म मे हुवा है। हा वो बात अलग है कि उनकी हिन्दूत्व की धारणा अलग है और मेरी अलग जो मुझे अबतक पूरी तरह से स्पष्ठ नही हुवी है। दूसरी वजह है की बचपन से हमे बताया गया है हिन्दू का दुश्मन मुस्लिम होता है और अक्सर हिन्दू मुस्लिम दंगे भी होते रहते है। औऱ जिसे एच-एम कहा जाता है। उस दंगो से हानि सामान्य लोगो को ही होती है। जिसमे हिन्दू भी होते है औऱ मुस्लिम भी उनकी कुछ हानी नही होती जो हिन्दू मुस्लिम के नामपर लोगो को आपस मे लड़वाते है। उनको तो फायदा ही होता है सत्ता में आने के लिए। आज एक ऐसा दौर चल रहा है जो हमे कुछ पुराने घटनाओं की याद कर देता है। एक ऐसा दौर जिसमे रोटी की बात नही होती रोजगार शिक्षा की बात नही होती बल्कि मंदिर-मज्जिद की बात होती है। किसान-युवा-महिला अपने हक़ के लिए रास्तेपर उतर आये है। जो अपनी हक़ की बात करता है उसको देशद्रोही कहा जाता है। कोई जाती की धर्म की सम्प्रदाय की चिकित्सा करे तो उनकी हत्या कर दी जाती है। कुपोषण से बच्चे मरे जा रहे है। भिड़ इकठ्ठा होकर शख ...
#बारूद_हत्या_औऱ_15_हज़ार क्या 15 हजार में हत्या ख़रीदी जाती है? हा 15 हजार में ही हत्या ख़रीदी जाती है। महाराष्ट्र के वर्धा जिल्हे में पुलगांव के आशिया खंड में दूसरे नबंर पर आनेवाला केंद्रीय बारूद भंडार जहासे देश के सीमाएं पर बारूद भेजना तथा काम मे नही आनेवाले बारूद बम्ब को नष्ठ करने का काम चलाया जाता था। जिस काम को प्रशिक्षित अधिकारीओ द्वारा किया जाना चाहिए था लेकिन चांडक नामक व्यक्ति को कॉन्ट्रेक्ट दिया गया और वह सरकारी न रहकर खाजगी बनगया अब जाएज़ है खाजगी होने की वजह से उस काम को करने के लिए वहां के गाँववाले मजदूर बिना प्रशिक्षण के बिना कोई सुरक्षा के लिए अपने पेट की आग बुझाने ने के लिए 200 रुपये में तैयार हो गए औऱ जिंदा बारूद उठाकर अपना जीवन व्यथीत करने लग गए। यहाँतक तो ठीक था लेकिन प्रशिक्षण औऱ कोई सुविधा न होने की वजह से जो होना था वही हुवा 20 नवम्बर 2018 को सुबह 7 से 8 बजे के करीबन बारूद की पेटी उतारते वक्त बम्ब का स्फ़ोट हुवा और एक अधिकारी सहित पांच लोगों की मौत हो गयी। अब इस घटना को अख़बार वाले वहाँके कुछ अधिकारी औऱ नेताये अपघात कह कर टालने का तरीका ढूंढ रहे होंगे। लेकिन वहाँपर म...
#बारूद__मजदूर__और__200__रुपए। क्या बारूद को सिर पर उठाने से पेट भरता था? हा बारूद को सिर पर उठाने से पेट भरता था पर आज मौत ने सारा किस्सा ही खत्म कर दिया ? वैसे रोज अख़बार पड़ने की आदत नही है मेरी लेकिन आज ग़लती से अख़बार पढ़ने के लिए हाथ में लिया और वह घटना मेरी नजर में कैद हो गयी। जिस घटना को अख़बार ने एक अपघात बताया था। जिस अपघात में हिंदी औऱ मराठी अखबार के मुताबिक 23 साल के दो 35 साल का एक औऱ चालीस साल के दो और उनके साथ एक अधिकारी कुल मिलाकर छह लोगों कि बारूद की पेटी उतारते वक्त मौत हो गईं जिसे मैं अपघाती मौत नही बल्कि एक हत्या कहूंगा। वर्धा जिले के पुलगांव में केंद्रीय गोलाबारूद भंडार है। जो आशिया खंड में दूसरे नबंर पर आता है। जहाँ से शक्तिशाली बम तैयार कर देश के सीमाएं पर भेजे जाते है। साथ ही जो बम काम में नही आते उसको नष्ठ करने की प्रक्रिया भी चलायी जाती है। उस प्रक्रिया के लिए हजारों एकड जमीन प्रयोग में लि जा रही है। और वहा पर गोलाबारूद भंडार है वह पुलगांव से 10 या 12 किलोमीटर के अंतर पर सोनेगांव औऱ केलापुर गावों के बीच में है। मतलब उस घटना से पिंपरी(खराबे), आगरगाव, नागझरी, एसगाव...
दलित_पैंथर_रामदास_आठवले_औऱ_अंबेडकर_वादी 2 नवंबर 2018 को महात्मा गांधी आंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में #दलित_पैंथर_आंदोलन इस विषय पर अपनी बात रखने के लिए दलित पैंथर को छोड़ चुके कार्यकर्ता, खुदको दलित पैंथर का आजीविक कार्यकर्ता कहने वाले, अंबेडकर वादी औऱ पैंथर समजने वाले भारतीय जनता पार्टी में सामाजिक न्याय मंत्री पदपर टिके हुवे रामदास आठवले आये थे। उनकी बातों को समझते हुवे सबसे पहला सवाल यह उठा कि इनको एक विद्यार्थी के रूप में समजना है तो कैसे समजू। अक्सर रामदास आठवले जी को या फिर उनकी बातों को लोग बोहोत हल्के में लेते है या फ़िर मजाक में लेते है क्योंकि उनका बोलने का अपना एक अंदाज है। फिर वह राज्यसभा हो या कोई आम सभा हो सब जगह अपनी कविता जिसे वो साहित्य समजते होंगे उसके साथ हसते हँसाते अपनी बात रखते है। बस उसही तरह इस बार भी अपनी बात को कविता के रूप में रखकर कार्यक्रम की शुरवात की कविता- दलित पैंथर आंदोलन में मुझे हर बार मिला धोका, इसलिए आपने मुजे दलित पैंथर पर बोलने का दिया मौका। सारा सभागृह हसने लगा लेकिन अगर उनके कविता को ठीक से समजे तो शायद ही आठवले जी के पूरी बातो को या ख़...
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आंदोलन की समाप्ति। दिनांक 7 अक्तूबर के शाम की ओ बात है जब में मेरी दोस्त को वर्धा स्टेशन को छोड़ के वापस विश्वविद्यालय आ रहा था। तब रास्ते मे मुजे एक अपाहिज युवा ने हात दिया और आगेतक आनेकी मदत मांगी मैने बे झिझक उसको अपनी गाड़ी पर बिठा लिया। थोड़ी देर बात उसने मुजसे बात की ओ बोला भैया कुछ काम होंगा तो बोलना! में जल्दी में था इसलिए मैंने ध्यान नही दिया लेकिन पोहोचने में टाइम था इसलिए मैंने भी उस्से वार्तालाप शुरू कर दिया। शुरवात में तो मैंने ये कहकर बात टाल दी कि में यहां का रहनेवाला नही हु। फिर भी अगर होता है तो में आपको कहदूँगा। ये कहकर मैं शांत हो गया फिर वो बोला में दसवीं कक्षा तक ही पढ़ा हु सब काम कर लेता हूं। यही रहता हूं वर्धा में फिर मेने अपना मौन खोला जैसे हमारे देश की राजनीति जब चाहे खोल देती है जब चाहे मौन कर लेती है। मैंने बड़े स्वाभिमान भरे शब्दो मे कहा पेट्रोलपंप पर देख लेना शायद मिल जाएगा। उसके पास मोबाइल तक नही था मैंने अपना मोबाईल नंबर उसे एक कार्डपर लिखकर दे दिया और कहा कि मेरे छात्रावास के रूम न. 26 में आकर मिलना में पूछता हूं अपने दोस्त से। मैने वैसे ही उसे आश्वाशन दे द...
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उस दिन की बात है जब नथुराम घोड़से जिंदा दिखा साथियो ये उस दिन की बात है, जिस दिन आजादि से लेकर 70 साल बाद भी हर साल 2 अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है और सिर्फ अहिंसा दिवस ही नही बल्कि साथ ही हिंसा दिवस भी मनाया जाता है। ओ बात अलग है कि अहिंसा दिवस तो बस नाम तक ही सीमित है बनाना तो हिंसा दिवस ही चाहते है। इस साल में 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र में था जहा मेरी समाजकार्य की पढ़ाई चल रही है। 2 अक्तूबर को सबेरे 6.30 बजे गांधी हिल पर प्राथना हुवी जो साल भर नही होती और नाही उसपर अमल किया जाता है। उसके बाद मेरे ही केंद्र महात्मा गांधी फ़्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र में 150 पेड़ लगाने की शपथ के साथ वृक्षारोपण किया गया। फिर 10.30 बजे गांधीजी को व्याख्यान में खिंचा गया और उनके दर्शनोंके साथ कई सारे विषयोंको शाम 6.00 बजेतक रखा गया। फिर दूसरे दिन पूरे देश मे चल रहा विवाद अंबेडकर वाद और गांधी वाद को "संविधान, समाज और गांधी" के विषय के अंतर्गत छेड़ा गया उस वाद विवाद पर अगर मेरी राय पूछो तो विचारो के आधारपर अंबेडकर ग...
प्रशासन के मनमानियों से शक्तितक मनमानियों से जी नही भरता तब प्रशासन अपनी शक्ति दिखाती है वह भी ऐसे छात्र छात्राओ के ख़िलाफ़ जो लोकतांत्रिक चुनाव लाना चाहती है। दिनांक 8 सेप्टेंबर 2018 से लेकर आज दिनांक 12 तारीख तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लोकतंत्रपर चलने वाले छात्र करीब साथ दिन से धरना कर रहे है। फिर भी प्रशासन अबतक उनसे बात नही कर रही है। आंदोलनकारीओ को बुलाकर छात्रसंघ बहाल नही कर रही है। आखिर ऐसी क्या बात है जो प्रशासन छात्रसंघ को बहाल करना नही चाहती क्यो डरती है आखिर छात्र संघ से प्रशासन। और छात्रसंघ होता किस लिए है जबभी प्रशासन के मन से प्रतिनिधि चुनकर जाता है तब ओ प्रशासन का प्रतिनिधि होता है। छात्र छात्राओं का नही फिर छात्र छात्राओं के हक्क के लिए उनकी बातों को रखने के लिए दिक्कत होती है। तब जरूरत होती है छात्रसंघ की। जिसका काम होता है छात्र छात्राओं की समस्या को समजना। उनको प्रशासन के सामने रखना और उसको लागू करवाना। और वह काम तब होता है जब किसी विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि छात्र छात्राओ के चुनाव से चुनकर जाता है। इस सारी प्रक्रिया को लागू करने के लिए कई छा...
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महिला और तृतीय पंथि का किरदार. साथियो आज में एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हु। जिसे पढ़कर आप शायद मुझे औरत का दर्जा दे सकते हो। या शायद मेरा मजाक उड़ा सकते हो वैसे भी हमारे समाज मे औरतो का मजाक ही उड़ाया जाता है उनको हमेशा कम समजा जाता है। अगर कोई औरत कह दे कि में अधिकारी बनाना चाहती हु या कह दे कि में पुरुषोसे हमेशा आगे ही रहती हूं। तो उसका मजाक उड़ाया जाता है। समजा जाता है कि वो कुछ कर नही सकती पुरुषो के आगे जा नही सकती। जबकि औरोतो की अपनी एक अलग पहचान होती है अपना एक अलग अस्तित्व होता है उसे पुरूषों से जोड़कर देखना यानी उनको कम समजने जैसा है। चलो छोड़ो उसपर अलग तरीकेसे लिखा जा सकता है। में अपने एक अनुभव के साथ शुरवात करता हु। में हमारे मु.जे. महाविद्यालय जलगाव में मानसशास्त्र इस विषय मे पदवी की शिक्षा ले रहा था तब हर किसी के महाविद्यालय में वार्षिक स्नेह संमेलन होता है वैसे हमारे महाविद्यालय में हुवा था तब उसमें लगभग दो साल मेरे दो दोस्तों के साथ मेने स्री(औरत) का पात्र निभाया था जिसमे एक साल सिर्फ दो औरत और दूसरे साल दो औरत और उसका एक पति जिसमे मेरा नाम था चंचला और दूसरी का नाम था मंचला...