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आंदोलन की समाप्ति। दिनांक 7 अक्तूबर के शाम की ओ बात है जब में मेरी दोस्त को वर्धा स्टेशन को छोड़ के वापस विश्वविद्यालय आ रहा था। तब रास्ते मे मुजे एक अपाहिज युवा ने हात दिया और आगेतक आनेकी मदत मांगी मैने बे झिझक उसको अपनी गाड़ी पर बिठा लिया। थोड़ी देर बात उसने मुजसे बात की ओ बोला भैया कुछ काम होंगा तो बोलना! में जल्दी में था इसलिए मैंने ध्यान नही दिया लेकिन पोहोचने में टाइम था इसलिए मैंने भी उस्से वार्तालाप शुरू कर दिया। शुरवात में तो मैंने ये कहकर बात टाल दी कि में यहां का रहनेवाला नही हु। फिर भी अगर होता है तो में आपको कहदूँगा। ये कहकर मैं शांत हो गया फिर वो बोला में दसवीं कक्षा तक ही पढ़ा हु सब काम कर लेता हूं। यही रहता हूं वर्धा में फिर मेने अपना मौन खोला जैसे हमारे देश की राजनीति जब चाहे खोल देती है जब चाहे मौन कर लेती है। मैंने बड़े स्वाभिमान भरे शब्दो मे कहा पेट्रोलपंप पर देख लेना शायद मिल जाएगा। उसके पास मोबाइल तक नही था मैंने अपना मोबाईल नंबर उसे एक कार्डपर लिखकर दे दिया और कहा कि मेरे छात्रावास के रूम न. 26 में आकर मिलना में पूछता हूं अपने दोस्त से। मैने वैसे ही उसे आश्वाशन दे द...
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उस दिन की बात है जब नथुराम घोड़से जिंदा दिखा साथियो ये उस दिन की बात है, जिस दिन आजादि से लेकर 70 साल बाद भी हर साल 2 अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है और सिर्फ अहिंसा दिवस ही नही बल्कि साथ ही हिंसा दिवस भी मनाया जाता है। ओ बात अलग है कि अहिंसा दिवस तो बस नाम तक ही सीमित है बनाना तो हिंसा दिवस ही चाहते है। इस साल में 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र में था जहा मेरी समाजकार्य की पढ़ाई चल रही है। 2 अक्तूबर को सबेरे 6.30 बजे गांधी हिल पर प्राथना हुवी जो साल भर नही होती और नाही उसपर अमल किया जाता है। उसके बाद मेरे ही केंद्र महात्मा गांधी फ़्यूजी गुरुजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र में 150 पेड़ लगाने की शपथ के साथ वृक्षारोपण किया गया। फिर 10.30 बजे गांधीजी को व्याख्यान में खिंचा गया और उनके दर्शनोंके साथ कई सारे विषयोंको शाम 6.00 बजेतक रखा गया। फिर दूसरे दिन पूरे देश मे चल रहा विवाद अंबेडकर वाद और गांधी वाद को "संविधान, समाज और गांधी" के विषय के अंतर्गत छेड़ा गया उस वाद विवाद पर अगर मेरी राय पूछो तो विचारो के आधारपर अंबेडकर ग...
प्रशासन के मनमानियों से शक्तितक मनमानियों से जी नही भरता तब प्रशासन अपनी शक्ति दिखाती है वह भी ऐसे छात्र छात्राओ के ख़िलाफ़ जो लोकतांत्रिक चुनाव लाना चाहती है। दिनांक 8 सेप्टेंबर 2018 से लेकर आज दिनांक 12 तारीख तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लोकतंत्रपर चलने वाले छात्र करीब साथ दिन से धरना कर रहे है। फिर भी प्रशासन अबतक उनसे बात नही कर रही है। आंदोलनकारीओ को बुलाकर छात्रसंघ बहाल नही कर रही है। आखिर ऐसी क्या बात है जो प्रशासन छात्रसंघ को बहाल करना नही चाहती क्यो डरती है आखिर छात्र संघ से प्रशासन। और छात्रसंघ होता किस लिए है जबभी प्रशासन के मन से प्रतिनिधि चुनकर जाता है तब ओ प्रशासन का प्रतिनिधि होता है। छात्र छात्राओं का नही फिर छात्र छात्राओं के हक्क के लिए उनकी बातों को रखने के लिए दिक्कत होती है। तब जरूरत होती है छात्रसंघ की। जिसका काम होता है छात्र छात्राओं की समस्या को समजना। उनको प्रशासन के सामने रखना और उसको लागू करवाना। और वह काम तब होता है जब किसी विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि छात्र छात्राओ के चुनाव से चुनकर जाता है। इस सारी प्रक्रिया को लागू करने के लिए कई छा...
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महिला और तृतीय पंथि का किरदार. साथियो आज में एक ऐसे विषय पर लिखने जा रहा हु। जिसे पढ़कर आप शायद मुझे औरत का दर्जा दे सकते हो। या शायद मेरा मजाक उड़ा सकते हो वैसे भी हमारे समाज मे औरतो का मजाक ही उड़ाया जाता है उनको हमेशा कम समजा जाता है। अगर कोई औरत कह दे कि में अधिकारी बनाना चाहती हु या कह दे कि में पुरुषोसे हमेशा आगे ही रहती हूं। तो उसका मजाक उड़ाया जाता है। समजा जाता है कि वो कुछ कर नही सकती पुरुषो के आगे जा नही सकती। जबकि औरोतो की अपनी एक अलग पहचान होती है अपना एक अलग अस्तित्व होता है उसे पुरूषों से जोड़कर देखना यानी उनको कम समजने जैसा है। चलो छोड़ो उसपर अलग तरीकेसे लिखा जा सकता है। में अपने एक अनुभव के साथ शुरवात करता हु। में हमारे मु.जे. महाविद्यालय जलगाव में मानसशास्त्र इस विषय मे पदवी की शिक्षा ले रहा था तब हर किसी के महाविद्यालय में वार्षिक स्नेह संमेलन होता है वैसे हमारे महाविद्यालय में हुवा था तब उसमें लगभग दो साल मेरे दो दोस्तों के साथ मेने स्री(औरत) का पात्र निभाया था जिसमे एक साल सिर्फ दो औरत और दूसरे साल दो औरत और उसका एक पति जिसमे मेरा नाम था चंचला और दूसरी का नाम था मंचला...
यूपीच्या छपरा शाळेत एका 9 वर्षाच्या बालिकेवर शिक्षक, मुख्यधापक सहित 15 विद्यार्थी बलात्कार करतात तेव्हा. भारत महिला असुरक्षिततेत पहिल्या क्रमांकावर जेव्हा येतो तेंव्हा देशात होणाऱ्या महिलांवरच्या बलात्काराला कोणत्या एका अंगाने पाहुन भागत नाही पॉर्न व्हिडीओ पाहिल्याने बलात्काराचे प्रमाण वाढत आहे, मुली शॉर्ट घालतात त्यामुळे बलात्काराचे प्रमाण वाढत आहे, संस्कृती लोप पावल्यामुळे बलात्काराचे प्रमाण वाढत आहे अशा अनेक अंगाने पाहून बलात्कारचं विश्लेषण करता येईल का हा प्रश्न कायम आहे. नुकताच यूपी एका शिक्षणाच्या मंदिरात झालेल्या सामूहिक बलात्काराचा आपण विचार केला तर त्यात बलात्काराचा व्हिडीओ काढून ब्लॅकमेल केलं जातं आणि मुख्यध्यापक सहित 18 विध्यार्थ्यांन कढून बलात्कार केला जातो तेव्हा या घटनेत काही विचारवंत प्रवक्ते म्हणतात की "इतक्या दिवस बलात्कार करत असताना त्या बलिकेने घरी अथवा पोलीस ठाण्यात सांगण्याची हिम्मत का केली नाही" तर त्याचा अर्थ त्यांनी कोणत्या अंगाने लावला असेल ते त्यांना आणि त्यांच्या बुद्धिमत्तेला माहीत, परंतु बलात्काराकडे पाहतांना तो बलात्कार वासना क्षमवण्या साठी ...
#मातंग #महार #चांभार #दलित #बुद्ध, #तेली #माळी #कुणबी #मराठा #राजपूत मातंग समाजाच्या नवरदेवाने मंदिरात प्रवेश केल्यामुळे 24 मातंग कुटुंबांना सोडावं लागलं गाव. बाबा साहेबांच्या काळाराम मंदिराच्या प्रवेशा नंतर ही वस्तुस्थिती सर्व बुद्धिजीवीना विचार करायला लावण्याजोगी आहे जाती पाती संपल्या म्हणून पळ काढणारी माणसाची जात जाती टिकवण्यात नेहमीच पुढे असते. हे का ? झालं असं होतं राहणार आहे का ? अजूनही स्वतंत्र भारतात मंदिर प्रवेश, विहिरीत पोहोल्याने पाणी बाटने, कनिष्ठ जाती ने मुछ ठेवल्यास हत्या करणे असे प्रश्न उपस्थित असतील तर माणसाला माणूस म्हणून वागवलं जाणार आहे का ? माणसाचा इतर शैक्षणिक, सामाजिक, राजकीय, आर्थिक प्रगती कधी होणार आहे का ? का फक्त वरिष्ठ जातीतील लोकांनीच त्यातही काही वर्गातील लोकांनीच प्रगती करता येणार आहे, समाजात मुप्तपणे वावरता येणार आहे ? इथल्या राजकीय पक्षांना या सर्व गोष्टींकडे पाहणे महत्वाचे वाटते की नाही का यांना जाती धर्म अजून घट्ट करायच्या आहेत आणि त्यावर राजकारण करायचं आहे ? या सर्व गोष्टींचा विचार जातीअंत, वर्गजातीअंत, मानवमुक्तीचा लढा लढणाऱ्या सामाजिक, राजकीय संघट...
लोकशाही की हुकूमशाही अलिगढ मध्ये एका शिक्षकाने फेसबुकवर ब्राम्हणवादावर पोस्ट टाकली म्हणून त्या शिक्षकाला पोलिसांच्या समक्ष आमदाराच्या पाया पडून माफी मागावी लागली. गुजरात मधील एका महाविद्यालयात अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषदेच्या कार्यकर्त्यांनी एका प्राध्यापकावर शाही फेकून प्राध्यापकाला मारहाण केली, त्याची मिरवणूक काढण्यात आली. एकीकडे गुरू आणि शिष्याची संस्कृती सांगायची आणि दुसरीकडे शिक्षकाला सत्तेचा माज दाखवत हुकूमशाहीने पाया पडायला भाग पाडायच. प्राध्यापकावर शाई फेकून त्याला मारहाण करणे याला नक्की म्हणावं तरी काय लोकशाही की हुकूमशाही? असा प्रश्न सध्या डोळ्यांसमोर येतो. कारण लोकशाहीला नाकारणारी "हे संविधान आम्हाला मान्य नाही म्हणणारी", "संविधान बदलनेके लिये हम सत्ता मे आये है" बोलणारी यांची विचारधारा जेव्हा संविधानाच्या मार्गाने सत्तेवर येते तेव्हा त्यांच्या कडून फार अपेक्षा करणे मूर्खपणाच ठरत. नुकतच आणीबाणीला ४३ वर्ष पूर्ण झाली. त्या निमित्ताने अपेक्षित असल्याप्रमाणे आमचे आदरणीय प्रधानमंत्री यांनी संधीचा फायदा घेत काँग्रेसवर टिकेचा आसूड सोडला. राजकारणाची पोळी...